प्रशासन
पहले ‘‘नोहर‘‘ का यह भू-भाग अतीव पुरातन क्षुद्रक, कुपाण, मोर्ग, गुप्त हैं व मुस्लिम प्रशसकों के अधिपत्य में अवश्य रहा है। 16वीं शताब्दी में वीर राठौड़ कांधला में नोहर की विजय कर बीकानेर राज्य में मिला दिया। बीकानेर के राजा रायसिंह (सन् 1630-68) ने यहां अपना गढ़ बनवाया और भूकरका राज्य के संस्थापक ऋंगसिंह के सुपुर्द कर दिया। महाराजा कुमार जोरावर सिंह यहां पर रहते थे। राज्यों के शासकों द्वारा पहले सारे राज्य को परगनों व चीरों में तथा फिर निजामतों व तहसील में विभाजित किया गया। बीकानेर राज्य में शुरू में (सन् 1884-85) चार निजामतें बीकानेर, सूरतगढ़, सुजानगढ़ और रेनी (तारानगर) में बनी।
निजामतों के हाकिम नाजम कहलाते थे। इनको दिवानी फौजदारी और माल के सीमित अधिकार प्राप्त थे इनके फैसलों की अवील कौन्सिल और कौन्सिल के फैसले की अंतिम अपील महाराजा के न्यायालय में होती थी। नोहर की तहसील रैनी (तारानगर) की निजामत के नीचे कार्य करती थी। सन् 1884 में बीकानेर के महाराजा डूंगर सिंह जी की मृत्यु होने पर रीजेन्सी कौन्सिल को इजलास खास के स्थान पर अंतिम न्यायालय बना दिया गया। पुनर्विचार न्यायालय की स्थापना की गई और 1894-95 में चुरू, बीकानेर और नोहर में आॅनरेरी मजिस्ट्रेट बनाये गये। उस समय नोहर के आॅनरेरी मजिस्ट्रेट यहां के सुप्रसिद्ध सेठ श्री जगन्नाथ जी थिरानी थे। सन् 1931-41 के दषक में रैनी (तारानगर) से निजामत के मुख्यालय को हटा कर राजगढ को मुख्यालय बनाया गया। इस तरह राजगढ़ निजामत के अन्तर्गत नोहर तहसील कार्य करने लगी।
सन् 1943-49 के बीच में जिलों का निर्माण किया गया और नोहर को गंगानगर जिले के अन्तर्गत रखा गया। सन् 1949 में बीकानेर राज्य का राजस्थान संघ में विलय हुआ तथा सन् 1948-49 में ही नोहर तहसील को निजामत घोषित किया गया। यहां के सर्वप्रथम नाजिम श्री गणेशसिंह जी राजपूत थे। स्वायत्त शासन के अन्तर्गत यहां नगर पालिका, ग्राम पंचायत न्याय पंचायतों का निर्माण हुआ।