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रहन-सहन

खान-पान :-
इस क्षेत्र की मुख्य उपज होने के कारण बाजरा व मोठ यहां के लोगों का मुख्य खाद्यान्न था। बाजरे की रोटी व मोठ बाजरे की खींचड़ी यहाँ का भोजन था। घरों में लोग गाय, भैंस रखते थे अतः दूध व दूध से बनने वाली चीजों का अधिक उपयोग किया जाता है। घी को सर्वाधिक महत्व प्राप्त था। गेहूँ च चना अधिकतर बाहर से आता था और इन का उपयोग मुख्यतया कस्बों में होता था। हरे शाकों व सब्जी के अतिरिक्त यहाँ पैदा होने वाले सूखे शाकों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता था। विशेष अवसरों पर पकवान व मिठाई बनाई जाती थीं बढि़या मिठाइयों में मेवा डालने एवं उन पर चाँदी के वर्क चढ़ाने की भी प्रथा थी। राजपूतों, मुसलमानों आदि जातियों में मांसाहार भी प्रचलित था। कुछ जातियों में शराब व अफीम का विशेष प्रचलन था तम्बाकू का प्रचलन तो सामान्य बन गया था।
वस्त्र :-
कमीज व धोती यहाँ का प्राचीन वेश था। धोती के अतिरिक्त सूथन का प्रयोग भी प्रचलित था। सूथन प्रायः रेशमी वस्त्र से बनाये जाते थे। पगड़ी का प्रयोग तो बहुत प्राचीन काल से है इसका उल्लेख वाल्मिकी रामायण में मिलता है। मध्ययुगीन नारी वस्त्रों में घाघरा, ओढ़ना, चोली-कांचली एवं अंगिया मुख्य रूप से पहनती थी सूती और रेशमी व ऊनी वस्त्रों के अतिरिक्त सर्दी में रूईदार वस्त्रों का भी उपयोग होता था। प्राचीन समय में बढि़या कपड़ों में पोपलीन, सिल्क, बोस्की साटन, मोराकीन, मोठड़ा, इरन्डी, समोस, पंचमीना, दिल ब्याज, करैप, आरगन्डी आदि माने जाते थे। साधारण वस्त्रों में पिकरा, खद्दर, ओढ़ना, पीला, पोमचा आदि माने जाते थे तथा चैक, लावण, मंजीठियां, जमावट ऊनी वस्त्र थे। वर्तमान में सूती ऊनी व रेशमी व टेरीलान, काॅटन, टेरालीन, नोलस्टर आदि में सैकड़ों प्रकार के वस्त्रों का प्रचलन है। पुरुष-महिलाएं , लड़का-लड़की में  आजकल ज्यादातर आधुनिक वस्त्र का चलन है।
आभूषण आदि :-
आभूषण प्रियता मनुष्य के स्वभाव में अत्यन्त काल से पाई जाती है। धातु की उपलब्धि के अभाव में स्त्री पुरूष मिट्टी व हड्डी आदि के आभूषण पहनते थे। गंगानगर के कालीबंगा के थेहड़ से प्राप्त मिट्टी की चूडियां व गले में पहनने के मनके आदि मिले हैं। जो नगर श्री चुरू के संग्रहालय में है। बाद में अनेकानेक आभूषणों का प्रचलन हुआ जिनमें से अनेक आभूषणें के स्वरूप आज भी विस्तृत हो चुके हैं। गहने प्रायः सोना व चांदी के बने होते थे। निर्धन, वर्ग की स्त्रियां रांगे की कड़ी इत्यादि पहनती थी।
विविधि :-
समाज में स्वर्ग-नर्क एवं पुर्नजन्म की मान्यता प्रबल थी। प्रेत व पित्तर योनि मानी जाती थी। ज्योतिष शास्त्र में लोगों का गहरा विश्वास था। स्वप्न में दिखलाई पड़ने वाले दृश्यों से शरीर के अंगों के फड़कने से प्रकृति के संकेतों से व अन्य अनेक प्रकार से फलाफल जानने के प्रयत्न किये जाते थे। जादू टोने टोटके यंत्र-मंत्र व सिद्वि में लोगों का विश्वास था। छोटे बडे युद्ध समय समय पर होते रहते थे। रोजगार के अभाव से दैनिक वेतन पर लड़ने वाले लोग भी मिल जाते थे। दिन सूर्योदय से माना जाता है। दिन रात मुहूर्तो अथवा पहरों व घडियों में बंटे होते थे। दिन में सूर्य व रात में नक्षत्र एवं तारे ही समय तथा दिषा ज्ञात करने के साधन थे। रात्रि को घरों में प्रकाश के लिए दीपक एवं बाहर मशालों का उपयोग होता था अतिथि का सम्मान करना और भिक्षुक को भिक्षा देना आवश्यक समझा जाता था।