जलवायु एवं पैदावार
यहां की जलवायु शुष्क किन्तु आरोग्य प्रद है। छहों ऋतुऐं यहां अपना प्रभाव दिखलाती है। गर्मी में बहुत अधिक गर्मी सर्दी में कड़ाके की सर्दी पड़ती है। मई और जून में तेज आधियां और लू चलती है। जिससे बालू के टीले उड़-उड़ कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर बनते रहते हैं। रेगिस्तान निरन्तर पूर्व की ओर बढ़ता जाता है। इन दिनों में कभी कभी जोरदार रेतीले तूफान भी आते हैं। जिन्हें ‘काली पिली‘ आंधी कहा जाता है। इनके कारण दिन में भी घोर अन्धकार छा जाता है। ग्रीष्म ऋतु में दिन में कड़ी गर्मी पड़ने पर भी रात्रि में तापक्रम काफी कम हो जाता है। क्योंकि बालू के टीले जहां शीघ्र गर्म हो जाते हैं वहां ठण्डे भी जल्दी हो जाते हैं। जून में तापक्रम 118 डिग्री फोरेनहाइट तक चढ़ जाता है और सर्दी में 5 डिग्री फोरेनहाइट तक गिर जाता है। मौसम विशेषज्ञ डा.रामास्वामी के कथनानुसार राजस्थान के इस भू-भाग में प्राचीनकाल में काफी वर्षा होती है और बड़े बड़े गहरे 2 जंगल थे।
यहाँ पर अकाल बहुत मात्रा में पड़ते हैं। प्राचीनकाल में यहां पर वर्ष में एक ही फसल होती थी जिसमें मुख्यतः मोठ, बाजरा, मुंग, ग्वार, तिल व ज्वार इत्यादि खाद्य पदार्थ होते थे। वर्तमान में यहां वर्ष में रबी व खरीफ की दो फसलें होती हैं। रबी की फसलों में जौ,चना और गेहूँ बोया जाता है तथा खरीफ की फसल में मोठ, ग्वार, मूंग, और ग्वार इत्यादि पैदा होते हैं। गन्ना, रूई, मूंगफली, प्याज, गोभी, नींबू, माल्टा, मिर्च, अमरूद इत्यादि की भी पैदावार की जाती है। अंगूर व केले लगाने का प्रयास किया जा रहा है।